मॉडर्न डे चाणक्य “शाह” और ब्रांड “योगी” के बावजूद क्यूँ हारी बीजेपी?

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एक हाथी जैसी गाड़ी , जिसमे साइकिल जैसे पहिये थे ने कमल का विजय रथ उसके होम टर्फ पे रोक दिया। जी है आज जो भी अकल्पनीय हुआ भारत की राजनीति में उसे इससे बेहतर शायद ही कोई समझा सके।

मीडिया बैन हुआ , कुछ छोटी मोटी हिंसा हुई पर शाम होते होते भाजपा की हर औपचारिकता मात्र ही रह गयी!

भाजपा का गोरखपुर, फूलपुर हारना ऐसा लगता है जैसे एक अद्भुत दृश्य हो और अगर वो परंपरागत गढ़ हो पिछले लगभग 30 सालो से तो आश्चर्य की मात्रा थोड़ी  और  बढ़ जाती है। एक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की पकड़ वाला जगह जहा भाजपा और गोरक्षनाथ मठ का बोलबाला 1989 से रहा और एक उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री की। बात सम्मान और प्रतिष्ठा की थी पर इसपे फूलपुर से नागेंद्र सिंह पटेल ने 59 हज़ार से ज़्यादा और गोरखपुर से प्रवीण निषाद ने लगभग 22 हज़ार वोट से जीत कर आंच ला दी है, जो आने वाले समय में एक भयावह प्रतिद्वंद्वी का रूप ले सकता है।

राजनीतिक गलियारों में फूलपुर की हार तो किसी तरह पच रही पर भाजपा का गोरखपुर हारना गले से नीचे नही उतर रहा, किसी को खुशी के मारे और किसी को मारे गम!

इन सब में एक प्रशन हर किसी की ज़ुबान पे होना लाज़मी है,कहाँ हुई चूक? आदित्यनाथ ने माना कि हम अति आत्म विश्वास से हार गए , जिसे मैं गुरुर कहना ज़्यादा सही समझता!

भाजपा जो एक ऐसी राजनैतिक संगठन मानी जाती है जिसकी चुनावी रणनीति और कार्यकर्ताओं की शक्ति का कोई तोड़ नही तो यहाँ साहब, चाणक्य और ब्रांड योगी से क्या गलती हुई?

  1. प्रत्याशी का चयन

गोरखपुर से अमित शाह के करीबी माने जाने वाले उपेंद्र शुक्ल को भारतीय जनता पार्टी ने टिकट दिया , जो भी थोड़ी बहुत पूर्वांचल की राजनीति को समझता है उसे पहली नज़र में ये समझ में आता कि यह योगी की नही चली, शुक्ल और योगी में तनातनी तबसे है जब योगी ने उनकी टिकट एक उपचुनाव नें काट दिया और शुक्ल फिर भाजपा के खिलाफ लडे पर हार गए। इस बार योगी भी खुश नही थी पर अपने किले को बचाने के लिए 12 रैलियों भी कर डाली, क्योंकि डर उन्हें अपने गुरुर को खोने का था इसलिए मतभेद जगजाहिर नही कर सकते थे।

ये भी खबर रही कि शुक्ल चुनावी प्रचार अपनी बुरी तबियत की वजह से सही से नही कर पाय जिसका काफी नुकसान भाजपा को हुआ।

  1. मठ से दुरी

1989 से अबतक 8 बार सीट तो यहाँ की भाजपा की रही पर हर बार प्रत्याशी मंदिर का, पहले महंत अवैद्यनाथ और 1998 से अबतक योगी आदित्यनाथ। गोरखपुर के लोगो के लिए चुनाव या प्रत्याशी कोई भी मंदिर से जो होगा वोट उसे ही मिलेगा, योगी की मुख्यमंत्री बनने के बाद कोई अनुयायी न चुन पाना और इस चुनाव में ब्रांड योगी के दम पर मठ की अनदेखी करना भी एक कारण रहा। कहने वालों ने ये भी कहना शुरू कर दिया है कि ये चुनाव योगी या मठ नही बल्कि, भाजपा की हार है।

  1. अविश्वसनीय गठबन्धन और जातिगत राजनीति

किसी ने नही सोचा था कि दो परस्पर धुर विरोधी एक हो जाएंगे, मतदान से चंद दिनों पहले हुए इस बुआ भतीजे की स्ट्रैटेजिक अलाइंस ने भाजपा समेत सबको भौचक्का कर दिया और यही भाजपा की हर का सबसे प्रबल कारण रहा। इस गठबंधन की सफलता का कारण रहा गोरखपुर का जातिगत समीकरण जिससे समझना आज के चुनाव को समझने के लिए बहुत ज़रूरी है।

यह ब्राह्मण और ठाकूर में एइतिहासिक मतभेद रहा है, योगी खुद ठाकुर है और ब्राह्मण विरोधी मने जाते रहे है और ऐसे में उनका ब्रांड बन न और उसके बाद सूबे के ब्राह्मण नेता और बाहुबली रहे हरिशंकर तिवारी के घर सी बी आई रेड ने इस आक्रोश को एयर गहरा किया। शुक्ला को उतार कर भाजपा ने उत्तर कर इसे कम करने की कोशिश की पर नाकाम रही ।

उधर प्रवीण निषाद एक काफी सोच समझ कर चला  गया सटीक दांव था, इलाके में 5 लाख से ज़्यादा निषाद, दलित आदि मतदाता है जो एक हो गए। योगी की सांस एक बार महज 7000 वोट से 1999 में बची थी, तब भी सामने जमुना निषाद गई थी पर उस वक्त योगी पर मंदिर का हाथ था। समाजवादी को बी एस पी के समर्थन ने वोट के ध्रुवीकरण को हिने से रुक जिसके परिणाम स्वरूप आज की तस्वीर रही।

  1. लो वोटर टर्न आउट

महज 45%  वोटर टर्न आउट ने भाजपा को मुकी खिला दिया, उनका परंपरागत शहरी वोट उस मात्रा में वोट डालने नही निकला जितनी उन्हें उम्मीद रही होगी।

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इस चुनाव के क्या मायने?

ये एक मामूली सा उपचुनाव मात्र होता अगर ये जगह गोरखपुर न होती, भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पाए न होती और योगी का ये किला न होता। योगी ने खुद चुनाव से पहले ये कह के मुसीबत और बढ़ा ली कि ये चुनाव उनकी सरकार पर रेफरेंडम होगा। इस चुनाव के झटके ने ये भी बता दिया कि ब्रांड योगी जिन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर अन्य चुनाव की ज़िम्मेदारी दी जा रही की ज़्यादा ज़रूरत नही बल्कि उन्हें उत्तर प्रदेश और उसके मूड को समझने की ज़रूरत है। ये बात भी तय है कि ये हर सीधे सीधे भाजपा के आलाकमान की हार है।  ये नतीजे आने वाले राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनाव और अगले साल के आम चुनाव के लिए जनता की मूड की तरफ भी इशारा हो सकते है, हालांकि कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी।

जहा ये मौका है भाजपा का चिंतन का वही विपक्ष को भी अब इस समीकरण और गठबंधन को लेकर और पारदर्शी और यशस्वी सोच दिखाने की ज़रूरत है।यहाँ सीधा मुकाबला भाजपा और सपा का रहा पर कांग्रेस को भी अपने डूबती नाव को बचाने का तरीका इस गठबंधन में देखने की ज़रूरत है। क्या हम फिर से महागठबंधन देखने वाले है, ये तो कहा नही जा सकता पर किसी ने ये ज़रूर सही कहा है कि संगठन में शक्ति है!

लेखक: अनुभव कुमार 

अनुभव द एनालिसिस के साथ संपादक हैं और गोरखपुर से हैं. यह फिलहाल अपनी लॉ की पढाई देहरादून स्थित UPES से कर रहे हैं. 

 

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