जनादेश 2018 – मध्यप्रदेश में खिला बिना भगवा वाला “कमल” 

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भारत में चुनाव अपने आप में बेहद रोमांचक होते है | चुनावी गणित के साथ साथ नए नए शब्द सुनने और समझने को मिलते है | ढेर सारे अंक, फैक्ट्स और डाटा के बीच पार्टियों के पोलिटिकल mindset को समझने में अलग मज़ा आता है | यह भी शायद एक अलग तरह का नशा है | अमित शाह और प्रशांत किशोर जैसे राजनेताओं को देख कर यह बात सही सी लगती है |

परसों से मोबाइल को दिनभर से खोल कर रखा है, एक मिनट न आँखों को आराम दिया है और न मोबाइल की स्क्रीन को, चुनाव के नतीजे और उसके बाद होने वाले पोलिटिकल ड्रामा को विस्तार से समझने की कोशिश में लगा हुआ हूँ | मैं यह सोचने में लगा था की मध्यप्रदेश में नतीजे को लेकर कुछ लिखूं या नहीं, क्यूंकि अभी मेरी राजनीतिक समझ बड़ी लिमिटेड और शायद कम है |

इसमें कोई दो राय नहीं है की कांग्रेस पार्टी के लिए यह जीत बेहद ज़रूरी थी | राष्ट्रीय स्तर पर अपने फुटप्रिंट को कम होते देख कांग्रेस पार्टी के सामने इन विधानसभा चुनाव के रूप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी | 2019 लोक साभा चुनावों में तीन राज्य (छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश) से 65 सीटें निकलती हैं जिनमें 62 पर अब कांग्रेस का कब्ज़ा है |

अगर आप कांग्रेस या जनतंत्र के समर्थक हैं तो आपको यह जीत ज़रूर अच्छी लगेगी | पर क्या कांग्रेस की यह जीत वाकई बहुत बड़ी है? अगर आप मध्यप्रदेश के इस पूरे चुनाव को बहुत ध्यान से देखें तो 15 साल के anti-incumbency या किसान आन्दोलन फैक्टर का फायदा कांग्रेस के नेता बहुत ज्यादा उठा नहीं पाए |

यह बात कांग्रेस को मिली 114 सीट और बीजेपी की 109 सीट से थोडा और पुख्ता साबित होती है | यही नहीं, वोट शेयर के मामले में भी बीजेपी और कांग्रेस बराबरी करते नज़र आये | दोनों दलों को 41% वोट पड़ा | 2008 में बीजेपी को 38% वोट पड़ा था | दूसरा, तीनो anti-incumbent मुख्यमंत्रियों के रूप में सबसे ज़ोरदार और दमदार परफॉरमेंस शिवराज सिंह चौहान का ही रहा |

रात 10 बजे तक बीजेपी ने कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ा था | यहाँ तक की कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत लाने में भी नाकामियाब रही है, 116 के मैजिक नंबर से 2 सीट पीछे ही कांग्रेस की गाडी रुक गयी |

230 सीटों में से 10 सीटों पर जीत का अंतर 1,000 वोट्स से भी कम रहा है | इन 10 में से 7 सीटें कांग्रेस ने जीती | 2013 में बीजेपी ने 6 सीटों पर कब्ज़ा किया था | करीब 8 सीटों में 1000 से 2000 वोटों का अंतर रहा, जिनमें से 3 सीट निकालने में कांग्रेस सफल रही | 13 सीटों पर NOTA ने बीजेपी के लिए पूरा राजनीतिक खेल बिगाड़ दिया |

इसके बाद 50 से ज्यादा op-ed परसों से पढ़ चूका हूँ, जो कांग्रेस की इस जीत को एक ज़ोरदार जीत साबित करने में लगे हुए हैं | कांग्रेस पार्टी की इस जीत को बढ़ा चढ़ा के दिखाना सिर्फ और सिर्फ डाटा, फैक्ट्स और फिगर्स के साथ न इंसाफी होगी | इस जीत को हासिल करने के लिए कांग्रेस को हिंदुत्व की ओर जाना पड़ा और कर्जा माफ़ी को लेकर बड़े बड़े ऐलान करने पड़े | उसके बाद भी दिग्विजय, ज्योतिरादित्य और नाथ एक दूसरे के दल के विधायकों के टिकेट काटते दिखाई दिए, जो की बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर का काफी बड़ा कारण रहा |

कमल नाथ एंड टीम को बहुत बहुत बधाई | और एक बार फिर अपनी बात को दोहराते हुए, की यह जीत कांग्रेस पार्टी के लिए बेहद ज़रूरी थी पर कमल नाथ और उनके कैबिनेट का फोकस राज्य के लिए एक नया गवर्नेंस रोडमैप और उसको क्रियान्वित करने की रणनीति पर होना चाहिए | शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश को काफी नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया और हमेशा एक सरल व्यक्तित्व के साथ अपने आप को राजनीति में आगे बढ़ाया |

कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा accessible रहे और सबको साथ में लेकर चलने की आदत रही, जो की बीजेपी की केंद्रीय हाई कमांड में अब कम देखने को मिलती है | अपनी विदाई पार्टी में अपने निजी स्टाफ के साथ डिनर कर के और अब राज्य की जनता का धन्यवाद करने हेतु “आभार यात्रा” की घोषणा करते हुए, शिवराज सिंह चौहान ने संवेदनशीलता और परिपक्वता का नया उद्धारण पेश किया है |

सच है: राजनीति में कई बार विपक्षी दल या नेता से बहुत कुछ सीखने को मिलता है | राजनीति अजब है, राजनीति गजब है |

 

 

Rishabh Shrivastava Author

The writer is the Founder and Editor-in-Chief of The Analysis.

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