क्या बीजेपी तोड़ पायेगी त्रिपुरा में 25 साल पुराना कम्युनिस्ट राज?

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60 सीटों वाले त्रिपुरा राज्य में 18 फ़रवरी को वोट डलने हैं और हिसाब से इन (नार्थ ईस्ट) राज्यों में हो रही कैंपेनिंग को हमारी मीडिया किस तरह कवर कर रही है, यह देखते बनता है. याद करिए जब गुजरात में चुनाव था, तब मीडिया किस तरह से कवरिंग दे रही थी पूरे चुनाव को. खैर छोडिये इस सब को.

“चलो पलटी” (चलो बदले) के नारे से बीजेपी ने अपना चुनावी बिगुल त्रिपुरा में बजा चूका है. पिछले 25 साले से कम्युनिस्ट राज के चलते बीजेपी के लिए इस राज्य में अपनी जगह बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती होने वाली है. कुल 60 सीट में से आज लेफ्ट के पास 50 और कांग्रेस के पास 10 सीटें हैं, जबकि बीजेपी के खाते में कोई भी सीट नहीं है. कांग्रेस पार्टी इस राज्य में दो बार अपनी सरकार बनाने में कामियाब रही है (1972 से 77 और 1988 से 93) पर बीजेपी को अभी  तक इस राज्य में सरकार बनाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है. इसके अलावा राज्य में 28 सीटें आदिवासी क्षेत्रों के लिए है. त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट कौंसिल एक्ट के तहत कौंसिल को इन् 28 सीटों के लिए अलग से चुनाव कराने की पॉवर दी है. आज इन 28 सीटों में  से 20 सीटों पर कम्युनिस्ट पार्टी का कब्ज़ा है. 2013 के विधान सभा चुनाव में राज्य में 93% वोटिंग टर्न आउट था, बल्कि 2014 के लोक सभा चुनाव में 80% टर्न आउट था.

त्रिपुरा, आदिवासियों का गढ़ माना जाता है. यहाँ करीब 19 मुख्य प्रजाति की ट्राइब्स रहती हैं. ऐसे में, आदिवासियों के लिए अलग राज्य की मांग रखने वाले Indigenous People’s Front of Tripura (IDFT) बीजेपी की इन् 28 सीटों को लेकर मदद करेगा. दोनों राजनैतिक दलों ने आपस में अलायन्स बनया है , और 9 सीटो पर IDFT लडेगा और बाकी बची 11 सीटों पर बीजेपी लडेगी. राज्य में ट्राइबल डेवलपमेंट को लेकर अच्छा ख़ासा डिबेट छिड़ा हुआ है. और ऐसा में कोई भी पार्टी अपने आदिवासी वोट बैंक को छोड़ेगा नहीं.

बीजेपी के राज्य अध्यक्ष सुनील देओधर बताते हैं की बीजेपी और संघ ने मिल कर पिछले 2 साल में ज़मीनी स्तर पर काफी मेहनत करी है. इस मेहनत का असर यह रहा है की ऑनलाइन मेम्बरशिप के जरिये अभी तक 2 लाख से ज्यादा लोग पार्टी से जुड़ चुके हैं. यहीं नहीं पार्टी व् संघ ने राज्य में ज़बरदस्त संगठन तैयार कर दिया है. बूथ लेवल पर 1 बूथ प्रभारी को 60 लोगों की ज़िम्मेदारी दी गयी है. और ऐसे पूरे राज्य में कुल 3,214 बूथ हैं.

फिर भी लेफ्ट के 25 साल पुराने और खतरनाक नेटवर्क को तोड़ पाना संघ और बीजेपी दोनों के लिए एक कड़ा इम्तिहान होगा. इसके बाद इसी साल बंगाल और केरल में भी चुनाव होना है जहाँ पर लेफ्ट काफी भारी है. कुल मिलाकर यह चुनाव बीजेपी के लिए काफी महत्वपूर्ण है.

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