संजू- बाबा की बाबागिरी

समाज ने जिस इंसान को कभी नहीं अपनाया और न कभी अपनाएगा, उसने समाज को कैसे अपनाया- संजू उसका एक बहुत ही खूबसूरत और नाज़ुक उधारण है. मूवी हॉल से बहार आते बस यह ही सोच रहा था की रोज़मर्रा ज़िन्दगी की छोटी छोटी चुनौतियाँ से खीज कर हताश हो जाने वाला मेरे जैसे इंसान को अगर इतना सब कुछ सहना पड़ता, तो शायद मैं घुटने टेक देता. पर बाबा का दोस्त कमली और उनके पिता दत्त साहब ने कभी बाबा का साथ नहीं छोड़ा. एक बाप और बेटे के रिश्ते को बाबा ने क्या बखूबी समझाया है. पर इस सब के अलावा एक चीज़ है जो मूवी को मस्ट वाच की लिस्ट में डालती है.

बॉलीवुड में पिछले पांच छह साल में कई फ़िल्में बनी जिन्होंने मीडिया की भूमिका को लेकर सही सवाल किये. पीपली लाइव ऐसी ही एक बड़ी ज़ोरदार मूवी थी. मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित तलवार में भी आरुशी तलवार हथ्याकांड में मीडिया की भूमिका को बड़ा गहरायी और आलोचनात्मक तरीके से दिखाया था. और अब संजू. इस मूवी ने बाबा को अपनी बात या अपना पक्ष रखने का मौका दिया, जो शायद से बाबा को कभी मिला ही नहीं.

आज अगर कोई तबका है जिसने फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन का सबसे गलत फायेदा उठाया है तो वह मीडिया ही है. इस बात को हम सब को मान लेना चाहिए. यह ऐसा समय है जहाँ फेक न्यूज़ पर कोई रोक नहीं है, संपादकों में अपना प्रकाशन आज़ाद रखने की हिम्मत नहीं है और पत्रकार स्टोरी ढूँढने के बजाये स्टोरी बनाना ज्यादा पसंद करते हैं. कोबरापोस्ट के हाल हे में हुए स्टिंग ऑपरेशन ने भी इस बात को साबित किया है की भारत का मीडिया अन्दर से सड़ चूका है और खासतौर पर इसका अब कोई ईमान नहीं रह गया.

मूवी ने मीडिया से ठीक वही बदला लिया है जो मीडिया ने संजू बाब की ज़िन्दगी से लिया. हमे मीडिया ट्रायल्स की इतनी आदत हो गयी हैं की बात संजू की हो या सलमान की या फिर तलवार दम्पति की, हमारे पास हमेशा कोर्ट के फैसले के पहले एक फैसला होता है. जिसको हम शायद से सवाल के तौर पे पूछने का कष्ट भी नहीं करते. बहुत हद्द तक, इसका कारण हमारी सुस्त न्यायपालिका भी है. क्यूँ हम ऐसे अखबार, टीवी चैनल या पोर्टल्स को फॉलो करते हैं? यह सवाल न पुछा जाए इसीलिए सारे मीडिया वाले घबरा के मूवी की नेगेटिव पब्लिसिटी करने में लगे हुए हैं. शेखर शर्मा का द प्रिंट हो या सिद्धार्थ वर्धराजन का द वायर, सब ने एक सुर से संजू के नेगेटिव experiences काउंट कराने की कोशिश की है. कम से कम 7-8 नेगेटिव स्टोरी पढ़ चूका हूँ.

क्यूँ हम संजू की गुंडागर्दी को सही दिखा रहे हैं? क्या संजू ने वाकई कुछ गलत नहीं किया? भूल जायें संजू की आतंकवादी गतिविधियाँ और उसकी गुंडागर्दी ? चरसी और लड़कीबाज़ संजू, क्यूँ राजकुमार हिरानी गलत चीज़ को सही दिखा रहे हैं? ऐसी कई हेडलाइंस आपको अलग अलग जगह मिल जायेंगी. अगर बाबा की जेल में टॉयलेट पॉट लीक करता दिखाया है तो उसमें सहानुभूति नहीं मांगी है, बल्कि देश में जेलों की क्या हालत है उसपे सवाल उठाने की कोशिश की गई है. ऐसे कई और उधारण हैं जिससे यह साबित होता है की संजू कहीं भी ऑडियंस से सहानुभूति नहीं मांग रही है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले इतने फैसले आ गये जिसके चलते शायद बाबा ने काफी कुछ खोया. आज मीडिया इंडस्ट्री एक खतरनाक तरीके से ऑपरेट हो रही है जिसके हम सब शिकार बन रहे हैं. रिपोर्टिंग का स्तर गिर रहा है और संपादकों का एथिकल स्टैण्डर्ड. मीडिया, कानूनी मुद्दों की सही रिपोर्टिंग करने में एक दम फेल रही है. शायद इसीलिए 2015 में अपनी सजा काट कर निकल रहे बाबा को उनका एक फैन फोटो न मिलने पर उनको एक आतंकवादी ही बुलाता है. यह सब हेडलाइंस भी बाबा को आज आतंकवाद और टाडा के चश्मे से देखती हैं.

अपने आप को एक नालायक बेटे और नाकामियाब बाप के रूप में देखते संजय दत्त समाज के लिए निश्चित कोई हीरो तो नहीं; पर हाँ हौसले, प्यार और दोस्ती की एक जीती जागती मिसाल हैं. अब फैसला आपको करना है!

लेखक: ऋषभ श्रीवास्तव (मुख्य संपादक, द एनालिसिस) 

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