पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) और लॉ की खूबसूरती !

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आज इंडियन एक्सप्रेस में एक शानदार संपादकीय छपा है (Dignity, for whom? 06/04/2018). इस लेख को 15 साल से बोन कैंसर को ट्रीट कर रहे एम्स अस्पताल के डॉक्टर श्री शाह आलम खान जी ने लिखा है. में आज इस पोस्ट को लिखने पर इसीलिए विवश हो गया क्यूंकि आज मुझे एक बार फिर एहसास हुआ की लॉ कितनी खूबसूरत चीज़ है और इसको देखने और पढने के कितने नज़रिए हो सकते हैं. आज जब पैसिव यूथेनेशिया जैसे नाज़ुक मुद्दे पर एक लीगल डिबेट पूरे देश में छिड़ा हुआ है, वैसे माहौल में यह लेख एक ज़बरदस्त नजरिया लाता है. और लॉ की खूबसूरती यही है की इसको आप अलग अलग दृष्टिकोण से देख कर इसको सही और गलत बतला सकते हैं. हाल हे में सुप्रीम कोर्ट ने कॉमन कॉज v. यूनियन ऑफ़ इंडिया के केस में पैसिव यूथेनेशिया वैध कर दिया है.

डॉ. खान का तरह तरह की बीमारियों को करीब 15 साल से एक दम पास से देखने और महसूस करने बाद यह मानना है की इंसान तब तक नहीं मरता जब तक वह वाकई में न मर जाये. यही नहीं, डॉ. खान यह भी बोलते हैं की सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिविंग विल को वैध बनाने से केवल पढ़े लिखे लोग ही इसका सही उपयोग कर पाएंगे. और यह हम सब जानते हैं की हमारे देश की अधिकतर जनता पढ़ी लिखी में नहीं गिनी जाती. ऐसे में मेरा भी यह सोचना है की लिविंग विल का कांसेप्ट काफी लोगों को फायेदा नहीं पहुंचा पायेगा.

“For many of us who treat terminally-sick patients, the judgment appears blemished as it bestows death (through passive euthanasia) upon some while “actively” denies it to others. A law that does not take into account the poverty and ignorance in society requires a serious re-think.”

दूसरा, मेडिकल कम्युनिटी का यह मानना है की अभी भारत में हेल्थ सर्विसेज पूरी तरह से डेवेलोप नहीं हो पाइ हैं, ऐसे में पैसिव यूथेनेशिया को वैध कर देना, पूरे हेल्थ सेक्टर पर अच्छा ख़ासा इम्पैक्ट दाल सकता है. अपने 15 साल के सर्जन के एक्सपीरियंस से डॉ. खान बताते हैं की काफी मरीज सीरियस बीमारियों से उठ कर चलना शुरू किये हैं, पर अगर आज इस स्टेज पर पैसिव यूथेनेशिया को स्वीकृति मिल जाती है, तो न केवल इसका मरीज या उसके परिवार वाले गलत इस्तेमाल कर सकते हैं बल्कि यह डॉक्टर के लिए भी बहुत बड़ी असमंजस की स्थिति बन जायेगी.

खान साहब होस्पाइस सर्विसेज का भी ज़िक्र करते हैं. यह कुछ ख़ास सर्विसेज होती हैं जो केवल बहुत बीमार मरीजों को दी जाती हैं. गूगल इन सर्विसेज को कुछ यूँ डिफाइन करता है: A Program of medical and emotional care for the terminally ill. भारत में पहला उद्देश in सर्विसेज को introduce करने पर होना चाहिए और उनको आगे डेवेलोप करना चाहिए. इन सर्विसेज के बिना पैसिव यूथेनेशिया का बड़ी आसानी से गलत फायेदा लोग उठा सकते हैं.

डॉक्टरों के हिसाब से पैसिव यूथेनेशिया हमेशा से नैतिकता और वैधता का विवाद रहा है. यह हमेशा से सही और गलत का विवाद रहा है. समाज अभी बढ़ रहा है, बदलाव देख रहा है- ऐसे में इस तरह की प्रक्रिय काफी हद्द तक परेशानी में ड़ाल सकती है.

The judgment makes an interesting point: “It is to be borne in mind that passive euthanasia fundamentally connotes absence of any overt act either by the patient or by the doctors.”

इसको समझाने के लिए डॉ. खान एक और बड़ा अच्छा तर्क रखते हैं. मान लीजिये की एक मरीज़ वेंटीलेटर पर पड़ा हुआ है और उसने लिविंग विल बना दी है, ऐसे में जो डॉक्टर मरीज की मृत्यु को सुपरवाइज़ करेगा उसके लिए यह फिर से नैतिकता और वैधता का विवाद बन जाता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, डॉक्टर जानलेवा इंजेक्शन नहीं दे सकता और अगर वो वेंटीलेटर हटा लेता है तो वो लीगल तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ जा रहा है.

इमानयूल कान्त का डॉ. साहब ने बड़ा ही ज़बरदस्त उधारण दिया है.

For passive euthanasia to be seriously considered as an option in a country like ours, we need to keep in mind the words of Immanuel Kant, the proponent of the principles of ethics which form the basis of medical ethics. He argued that morality can’t be based on happiness; moral principles have to be derived from practical reason alone.

लेखक: रिषभ श्रीवास्तव (मुख्य संपादक)