नेता सड़कों पर!

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यूं तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है मगर 70 बरसों की आज़ादी में बहुत कुछ यूं ही चलता आया है जैसे कि हर चुनाव में नेता का सड़कों पर आना। ये तो ख़ूबशूरती है लोकतंत्र में, वरना जो अगर खेल 5 बरस का ना होता तो लोग अपने नेता को ही भगवान मानकर पूजने लगते (वैसे आज भी करते ही है)। हर पाँच बरसो के इस खेल में, दर्शक माफ़िक बैठी जनता, गणतंत्र का उत्सव भी मनाती है। मगर खेल के असली खिलाड़ी नेता ही हैं जो अपने-अपने लोगो का प्रतिनिधित्व करते मैदान में कूद परतें है (नेता सड़क पर)।

बीते चार वर्षों में देश मे कितना कुछ बदला, हवा बदली, रंग बदली, गिनकर 22-23 राज्यों में सरकारें बदली (भाजपा, कांग्रेस, आप एवम अन्य मिलाकर) मगर जो एक खेल चुनावी खेल का बदला वो ये की नेता अब सड़क कम टी.वी. पर ज्यादा आने लगे (आधुनिकता), और तो और देश पूरा डिजिटल भी ना हुआ और होर सोशल मीडिया पर कायम ही है, आए दिन नेता की हैसियत उसी सोशल मीडिया प्रबंधन से ही होती है। दर्शक ( जनता) अपने इस पसंदीदा खेल से दूर कैसे होते सो वो भी मौजूद है ट्रॉल्स की माफ़िक।

अब नेता होना आम बात तो है नहीं, बदलते भारत में नेता सड़को के संघर्षों से कम, पहले की तरह ही अपने पृष्ठभूमि के दम पर ही ज़्यादा निकलते है। नेता- मंत्री के बाल- बच्चे को स्पेशल कोटा है। ऐसे में, नेता बनने का इरादा लिए आप अगर सड़कों पर दिखे तो इनका पूरा खेल ही बिगड़ जाए। सो अब खेल पॉलिटिकल मैनेजमेंट या कहें इलेक्शन मैनेजमेंट का हो कर रह गया है। 3D रैलियाँ याद हैं ना। सब मिले हुए हैं जी !! मित्रों !!

ऐसे में अति मजबूत सत्ता का होना या विपक्ष का बेहद कमजोर होना, वर्तमान में हमारी लोकतंत्र की मजबूरी है। नेता अब सड़क से गायब हैं। कोई किसी की सूद लेने वाला नहीं मसलन चाहे वो छात्रों का मसला हो या किसानों का। 70 साल के देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी जैसे बेसिक सुविधाओं का ना होना कितने लज़्मी प्रश्न है पूछने को मगर देश में पूछ कॉर्पोरेट और ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस की है, जनता में उलझी ही है कि कुछ तो अलग और सॉफिस्टिकेटेड का साउंड करता है विकास के नाम पर। आने वाले दिनों में चुनावी वादों का पिटारा खुलेगा और लोग फिर एक झांसे वाले सपनों के साथ सो जायेंगे। नेताओं ने यहाँ भी चुपके से “घोषणा पत्र” का नाम “विज़न डॉक्यूमेंट” रखा है ताकि सपनो का कारोबार लम्बा जा सके।

दोस्तों! ऐसे में आज़ादी की मांग करता कोई युवा अपने लाचार व्यवस्था से संघर्ष करता सड़कों पे आ जाए, अपनी मांगों का स्वर बुलंद करता, अपने ही लोगों को प्यार का पैगाम देता सड़कों पर आए तो समझना “नेता सड़कों पर है”। वो नेता जो लोकतंत्र की आवाज़ है, वो नेता जिसे देश से प्रेम है, जिसे देश के संविधान में आस्था, विश्वास और समर्पण है।  जो एक ऐसे देश की कल्पना करता है जहाँ नेता होना पैसा वाले होने से ज़्यादा अपने आदर्शों वाला होना हो ! (नोट: आदर्शों वाला माने ये भी नहीं कि वो प्यार भी ना करें।)

लेखक: अश्विनी कुमार , लॉ स्टूडेंट (सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार)